एक खामोश नदिया सी वही जो साथ बहती है
के झुरमुट से ख़्वाबों के वही जो साथ चलती है
वही खामोश लड़की है जो आगे चल नहीं सकती
कि एक नाराज़ दरिया सी जो श्रष्टि भी समा लेती
वही खामोश लड़की है जो दम्बा भी है और काली भी
बस एक सुनसान बस्ती की जो ना बनती मुसफ़िर भी
जो उस इतिहास को बदले जो ना गवारा था हमें
बनीबनायीं किताब का क्या क्यों पढ़ना उसे यूँ ही
कि कुछ बदलो इस सृष्टि में अँधेरे हैँ इधर छाये
कि इतिहास फिर से कभी ना इसे दोहराये
कि रक्त रंजित खड़ग है बस साथ शिव चलते रहें
देख लेंगे उन्हें भी जिन्हें गर्व इतिहास का है
कि मातृ भूमि बस मात की है स्वयं शिव सेवक बने
कि फिर ना कभी मात को कोई जगत में भूल सके
जग मात से ही है कि झोली में शिव आ गिरे
सब मातृ भूमि पर ही जन्म लेते हैँ जगदंब से पौरुष उधार लिए
उस मात का ही है सब जग भी जीवन भी
वही प्राण है जीवन का वही सृष्टि वही शक्ति
कि प्राण जिस शरीर का है वो गर्व ना करे स्वयं पर यूँ ही
बस प्राण शिव के भी उसी मात के दिए हैँ स्मरण रहे

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