मंगलवार, 27 जनवरी 2026

यहीं तिरछी नज़र हमारी हुई... हिंदी कविता hindi poem

हिंदी कविता ईश्वरीय प्रेरणा द्वारा

यह कविता जीवन के उन पहलुओं को छूती है जिन्हे पाना सांसारिक जीवन में आसान नहीं है । वह व्यक्ति जिसने जीवन के एक ही बिंदु को छुआ हो उसे ही इस प्रकार की कविता का उद्देश्य समझ आता है।

जब आप परालौकिक जगत की अनुभूति करते हैं...

तब वर्ण, शब्द और लेखन सब कुछ परालौकिक होता है सब कुछ ईश्वरीय कृपा से ही प्राप्त होता है यह कविता एक गीत है जो ईश्वरीय है....

यह कृपा यूँ ही चलती रहे जब तक साथ रहे...




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यहीं तिरछी नज़र हमारी हुई,

कभी जो सभी समंदरों के नाम थी।


यही चाहत है … अब साथ यूँ ही बना रहे,

चाहे शाम ढले या सुबह आ जाये, 

हमारा नाम ये दुनिया लेती रहे,

तुम्हारे नाम से अब हमारा नाम जुड़ जाये ।


हमें मोहब्बत थी, मोहब्बत है …

कभी नहीं कम होती.. बढ़ती जाये

 बस यही चाह है …


हमारा ज़िक्र किताबों में, किताबी ही है,

हम कहाँ हैं, ज़माने को पता नहीं।


तमन्ना तुमसे मिलने की कभी कम नहीं होगी,

भले ही दिन बीत जाये कितने ही …

परवाह नहीं हमको ज़माने से दूर रहने की

अगर तुम मिलो हमें ज़मीं पर यहीं ।


किताबें खोल दी हमने तुम्हारे लफ्ज़ पढ़ने को,

तुम्हारी चाह ही हमको शायर बनाती रही …


सुबह का फासला अक्सर तय होता नहीं था हमसे,

भले ही लोग कह देते की हम देर से आते हैं ।


तुम्हारी मुस्कुराहट भी कभी ऐसी नहीं मिलती थी,

तुम्हारे इंतज़ार में हमने यहाँ सदियाँ गुज़ारी हैं …


वही शायर, वही प्रेमी, वही लेखक, वही हमदम, 

जो लिख दें उनके ही ऊपर कि ' वो है ' तो ही है, हमदम,

वफाई भी रिहाई भी,

जिन्हे मिलकर दुनिया भूल जाते थे कभी,

उनकी  याद में ही दुनिया बनाते थे कभी ।


बनाना भी मिटाना भी यही काम था हमारा,

बस एक प्यार की खातिर हमें रुकना पड़ा यहाँ भी ।


इंतज़ार क्या हैं, बस एक लम्बा सा सफर 'शायर,'

नहीं खत्म होता दिखे जो वो इंतेज़ार ही क्या ?


कभी खामोश साँसे राह पर बिछ जाती यहीं,

कभी चुप रात की महक हमको सताती रही,

हमें अक्सर पकड़ा है अंधेरों ने हमेशा ही,

उजालों से हमारा सामना अभी दो चार दिन से है।


कभी.मौसम कभी खुशबू कभी सैलाब, दरिया तुम,

अभी ठहरो यहीं पर तुम कि हमको तुमसे मिलना है ।


तुम्हीं बहती तुम्हीं कहती तुम्हीं चलती दिशा बनती,

तुम्हीं वो चाँद जिसको हम तालशें भी तराशे भी ।


कभी सच्चाई ना मिटती बस एक चाह बनती है,

कि उस चाह से बनकर हम ही दुनिया में आते हैं ।


हम ही शायर हम ही फनकार हम ही संगीत की धुन हैं,

 हमें पहचानना अक्सर सभी के बस की

बात नहीं...


कभी सावन की तरह आती थी, कभी सागर की तरह प्यासी थी नज़र

वही सावन वही सागर मगर तू नहीं है, है तो बस एक सफर ।


कभी हमसे मिलो तो सही

कुछ पुरानी कुछ नयी

याद और बात का सिलसिला 

जारी रहेगा हमेशा यूँ ही ।


हमारा ज़िक्र उनको अक्सर नागवार लगा है,

जब जब उन्हें हमारे कुछ और बन जाने का पता चला है,

कभी भी हम नहीं भुलाते तुम्हें...

हम ही खामोश हो जाते जब जब हमारे दर्द के होने का  पता चला है


एक अंधेरा जिसमें कुछ नहीं मिलता,

वही अक्सर हमें लेकर कही गुम हो ही जाता है ।

हमें नादान समझना तुम्हारे ही बस में है,

नहीं तो हम तबाही हैं फलक तक भी ज़मीं तक भी …

बस एक मासूम चेहरा है ख्यालों में,

जिसे पाने को नयी दुनिया बसायीं है ।






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