कभी मंज़िल की तलाश थी हमें,
कभी सैलाब की कमी रही,
कभी उतराना पसंद ना था,
कभी जज़्बात की कमी रही ।
एक खामोश सा सफर साथ चलता रहा,
बस एक आह सांस भरती रही,
कि तन्हा समंदरों से हमने ना बात की कभी,
बस एक आस यूँ ही दिल में दिया जलाती रही,
कि सौंध जाये बस तन मन संग
कि आंसुओं का समा दूर हो कभी ।
बस एक प्रेम अग्नि सत की जले
अंधकार सब मिट जाए,
अब एक विश्व यूँ जल जल कर
बस प्रकाश ही भर जाये ।
यूँ सत्य श्याम सा रौशन है
कि अंधेरा अब होगा नहीं,
बस याद प्रेम की बनकर के
नव विश्व बना धरा पर यहीं ।

