किस जगह के लोग हैँ हम,
बस याद एक ही बात आती है,
सच्चाइओं से दूर जग,
तेरी तस्वीर ही साफ नज़र आती है ।
कि हम उस गली ना गुज़र सके जिस गली
हमें ना सांस आ सकी थी ।
हम बस इंतज़ार में ही बैठे रहे,
कि मुसाफिर की मंज़िल अभी दूर थी ।
सफर ही सफर में जब नैन खुले,
तो देखा की सुबह हुई,
नहीं तो रात भर की करवट
कब ख़त्म होंगी पता ही ना था ।
कि याद तुम आती रही,
बस शक्ति ही बस शक्ति ही,
जीवन मिला तुम्ही से है,
अब और कुछ अपना नहीं ।
तुम संग जीवन मिल चुका जो
वो ही कीमती है
कि जिस सांस ने छुआ नहीं...
वो अपना कभी था नहीं ।
