शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

Hazaron kafilon se durr .kahin jo...

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 हजारो काफ़िलो से दूर कहीं जो शाम ढलती है...

कहीं बिछड़ी कहीं मिलती हमारे कारवां तक ​​ही...


तुम्हारे नाम को सुनकर हम यू ही रुक गए हमदम,

तुम्हारे नाम से बढ़कर  जहाँ में कुछ नहीं था,

हमारे चाह जाने को जमाना यूँ नहीं समझे

कि तुम ही तो दुनिया थी जहानो में, ज़मानो में,


हिन्दी शायरी इन हिन्दी



कहीं यूँ धूप बनती है कहीं यूं छाँव बनती है,

ज़माने के हिसाबों में हमारा ही निशां  ना था,

वही जज़्बा वही हिम्मत हमें पाने को व्याकुल है...

जिसे ज़ालिम ज़माने ने ना पहले कभी समझा

तसल्ली है कि तुम मेरे पास हो 

नहीं तो आंधियों ने अक्सर गहरी जड़े खोदी । 


वही है सोच अब गहरी...जहाँ कोशिश ना की हमने,

हिंदी शायरी इन हिन्दी

किताबी ज्ञान से जब हम बढ़े आगे

तुम्ही बस सामने थी...

मुझे थामे अँधेरो में ।

उजालो तक सभी साथ निभाते हैं अक्सर

कभी खामोशी का साथी नहीं बनता कोई

युगों लंबी तन्हाई में कोई बात नहीं करता

बस बात ही है जो साथ निभाती रही

 वरना समंदर भी खाली था कभी...



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