कि प्रेम भाव कभी छुपता नहीं
बस वक्त की ताकत कभी हर दम नहीं रहती,
कि इक नादान दरिया है जो निश्छल बह चला है यूँ
कि बस खामोश बातों का समा बनता चला गया ।
तब एक लहर उठती है वहीं गिरती वहीं उठती,
अंधेरों से उजालों तक वही उस राह जाना है
कि अक्सर हमें खुश राह कहकर वही छोड़ा
जहाँ जन्नत मिले यूँ ही अगर हमराज़ तुम हो सच ।
कल की कोई खबर है क्या यहीं है वो
कि तुम ही काल थी मेरी हकीकत में,
तुम्हारे साथ चलने को मिट गए तुम्हारे संग
सच यही है तुम साथ थी हरदम,
तुमने छोड़ा नहीं हमने पकड़ा वहीँ
तुम्हारा साथ हमें ब्रह्म बना रहा ।
हम दूर थे पर अब करीब तुम वहीँ शक्ति जो हमें शिव बनाती रहीं
शिव शक्ति संग बोल पा रहे कभी खामोश लफ्ज़ो की भाषा ना बन पायी थी,
पर अब कुछ है जो भाव परिपूर्ण है
कि शायद नया युग प्रारम्भ है अंधेरों से दूर,
समय आने तक
कि सफर समय से समय का ही है,
बस साथ है एक छाया सी
तुम्हारी ही ।
अब तुम वर्ण बन छा जाओ जग पर
कि तुम्हारा सत ही हमें मिले फिर यूँ
कि तुम ही शक्ति तुम ही शिव बन फिर
हमें मिल जाओ कि हम तुम्हारे ही संग सदाशिव हुए ।
तुम ही ब्रह्म तुम ही संग तुम हम पूर्ण
हम ई बन समय चक्र बन फिर मिलें यूँ
कि पुनः हम मिल जाएँ ।